Sunday, 4 August 2013

Banjarapan....!!

बंजारे  की तरह फिरता है मन , कभी गुज़र के देख उसके  नगर |
बादल बन गरजता है मन, बरस ज़रा ,कभी रात भर ||
कोयल बन गाता है मन, न तू दिल में रख , कभी शोर कर |
पंछी बन चेह्चाहता है मन, कभी सांस ले के उड़ान भर ||
रंगों  में मिल जाता है मन, कभी रंग भर ,रंगरेज़ बन |
हवा सा जो बहता है मन, न ठहर कहीं तूफ़ान बन ||
न तो रंग भेद न तू द्वेष कर, तू संभल ज़रा, इंसान बन ||






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