Sunday, 26 August 2012

उफ़ ये रुसवाई का डर।।
 न दर्द संभालता है, न कशमकश ख़त्म होती है  ।
 कभी इन्तेकाम लेने का जूनून होता  है, तो कभी  माफ़ कर देने में  सुकून मिलता है ।
ये कभी न ख़त्म होने वाली ज़हन की जंग है , जिसमें कभी हम जीतेते हैं तो कभी दिल जीतता है ।।


गर करते हम अपने इश्क का ज़िक्र इस दुनिया से  ,
तो वो बेवजह बदनाम हो जाते ।।
वो कौन है जो कहता है उसको मोह्हबत नहीं हुई,
इस दर्द से तो  हर एक दिल गुजरा होता है  ।।
कहने को ज़रा सी बात है , ये जो बदले हालात हैं ।
क्यों  आँखें  नम हो जाती हैं ,जब याद उन पलों की आती है ।।

क्यों होती है बेचैनी सी,जब ज़िक्र तुम्हारा होता कहीं ।
क्यों धड़कन ठहर जाती है , जब तेरे आने की आहट होती है ।।

क्यों दिल इजाज़त देता है ,तेरे एक दीदार का ।
जब इल्म है तू मेरा नहीं ,बनेगा किसी और का ।।

क्यों एहसास होता है तुझे मेरी बेंतेहाँ मोह्हबत का ।
क्यों तेरे हर इन्कार से , तेरी एक मजबूरी सी झलकती है ।।